Central Sambvad रायपुर, 14 मई 2026/ छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावकी वन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड द्वारा इस तकनीक के जरिए शहरी, औद्योगिक और खनन प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जा रहा है।

मियावकी तकनीक जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित की गई है। इस पद्धति में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अधिक घनत्व में लगाया जाता है, जिससे 3 से 5 वर्षों में घना और आत्मनिर्भर जंगल तैयार हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में अधिक तेजी से हरियाली विकसित करती है।राज्य में वर्ष 2022 से लगातार इस पद्धति के तहत वृक्षारोपण किया जा रहा है। कोटा, गेवरा, रायगढ़ और बारनवापारा सहित कई क्षेत्रों में हजारों पौधे लगाए गए हैं। वर्ष 2025 में भी कई परियोजनाओं के तहत बड़े स्तर पर पौधारोपण कार्य जारी है।

कोरबा जिले के गेवरा क्षेत्र में 12.45 हेक्टेयर डंप क्षेत्र में 33 हजार से अधिक पौधों का रोपण किया गया है। कोयला खनन के बाद अनुपजाऊ हो चुकी जमीन को वैज्ञानिक पद्धति से हरित क्षेत्र में बदला जा रहा है। यहां नीम, शीशम, करंज, आंवला, बांस, महोगनी और महुआ सहित कई प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि मियावकी वन अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं और वायु व ध्वनि प्रदूषण कम करने में मददगार साबित होते हैं। साथ ही यह तकनीक भू-जल संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने में भी उपयोगी मानी जा रही है।वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है। आने वाले वर्षों में ये क्षेत्र सघन हरित वन और जैव विविधता से भरपूर जंगल के रूप में विकसित होंगे।

