दूरदर्शन के उस दौर को याद कीजिए, जब रामायण और महाभारत जैसे सीरियल्स शुरू होते ही घर का माहौल बदल जाता था। उस दौर में तकनीक सीमित थी, लेकिन दर्शकों का रिश्ता बहुत गहरा और भावनात्मक था।आज जब सिनेमा AI, VFX और बड़े बजट के दौर में है, हनुमान अंश जैसी फिल्म का आकर्षण इस बात में है कि फिल्म सिर्फ आधुनिक तकनीक और बड़े बजट के भरोसे नहीं चलती।इस फिल्म में इसके सहज पात्र, लोकगीतों की महक और आस्था से जुड़ी कथा धीरे-धीरे दर्शक को अपने संसार में ले जाती है।

फिल्म की रेट्रो कलर ग्रेडिंग भी एक खास भूमिका निभाती है। पर्दे पर उभरते रंग,प्रकाश और दृश्यों में पुराने समय की स्मृति और एक तरह की नॉस्टैल्जिया महसूस कराती है।जो कहानी के भाव को और गहरा करती है।शायद यही वजह है कि तमाम चमक-दमक और शोर के बीच दर्शक फिर ऐसी कहानियों की ओर लौट रहा है, जहां उसे अपनी जड़ें दिखाई दे रही है , जहाँ अपनी संस्कृति, अध्यात्म, लोकजीवन और आस्था की एक चिर परिचित सी खुशबू मिलती है।
भारत की पवित्र भूमि अनेक संतों और सिद्ध महात्माओं की कर्म भूमि रही है जिनके बारे में जानना आज की पीढ़ी के लिए बहुत जरूरी है।इन पर आधारित पुस्तकों का लेखन, अध्ययन और पठन के साथ साथ ऐसी फिल्में भी बनाई जानी चाहिए।
नीब करौली बाबा से मिलने ,Apple के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स भी अपने जीवन के शुरुआती दिनों में आध्यात्मिक मार्गदर्शन और प्रेरणा की खोज में 1974 में भारत आए थे।इसके अलावा Facebook (Meta) के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भी कैंची धाम आकर शांति और नई दिशा पाई थी।हॉलीवुड की मशहूर ऑस्कर विजेता अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स बाबा नीम करौली से प्रभावित रही।

इस फिल्म को देखने पहुँची दर्शकों की भीड़ बताती है , तकनीक भले ही बहुत आगे निकल गई है , लेकिन मन को छू लेने वाली सच्ची कहानियों की जरूरत आज भी वही है।हनुमान अंश ज़रूर देखिए, एक फिल्म के साथ-साथ उस भाव को महसूस करने के लिए, जो हमारी स्मृतियों और हमारी आस्थाओं से जुड़ा है।

