डॉ. मनोज कुमार मणि चतुर्वेदी

Central Samvad , Raipur
बस्तर के किसी गाँव की सुबह कल्पना कीजिए। आसमान में हल्की धुंध है, खेत की मेड़ पर एक बुज़ुर्ग किसान खड़ा है, और उसकी आँखें बादलों को पढ़ने की कोशिश कर रही हैं। पचास साल से वह यही करता आया है—बादल देखो, हवा सूँघो, बीज बोओ। पर अब बादल झूठ बोलने लगे हैं। आषाढ़ में सूखा, अगहन में बारिश, फागुन में गर्मी—मौसम का पुराना कैलेंडर फट चुका है। यह केवल एक किसान की कहानी नहीं है; यह छत्तीसगढ़ के लाखों परिवारों की साझी बेचैनी है।हम बरसों से इस धरती को ‘धान का कटोरा’ कहते आए हैं। यह नाम महज़ कृषि-समृद्धि का बखान नहीं, बल्कि उस जीवन-शैली का चित्र है जहाँ खेत, जंगल, नदी, मौसम और मनुष्य एक-दूसरे में घुले हुए हैं। यहाँ समाज ने प्रकृति से लड़कर नहीं, उसके साथ चलकर जीना सीखा है। लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक में जो बदलाव आया है, उसने इस पुराने रिश्ते की बुनियाद हिला दी है। बारिश का मिज़ाज बिगड़ा है, गर्मी का पारा ऊपर चढ़ा है, जलस्रोतों पर दबाव बढ़ा है और खेती के भरोसे पर जंग लग रही है।

जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण की चिंता नहीं—यह छत्तीसगढ़ का सामाजिक प्रश्न बन चुका है।
आँकड़ों से नहीं, आँगन से समझिए
इस मुद्दे को केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों और ग्राफ़ से नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिए खेत की मेड़ पर बैठना होगा, जंगल की हवा में साँस लेनी होगी। उन महिलाओं की दिनचर्या देखनी होगी जो पानी, ईंधन और भोजन की व्यवस्था के बीच हर दिन एक अदृश्य युद्ध लड़ती हैं। उन युवाओं की बेचैनी सुननी होगी जो बदलती परिस्थितियों में नई आजीविका तलाश रहे हैं।जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा सच यह है कि यह सब पर एक जैसा असर नहीं डालता। इसका बोझ सबसे ज़्यादा उन कंधों पर पड़ता है जो पहले से ही सीमित साधनों के साथ जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। अमीर के पास एसी है, गरीब के पास केवल पसीना; सिंचित खेत वाले के पास विकल्प हैं, भूमिहीन मज़दूर के पास केवल आकाश।
खेत से रसोई तक फैलता संकट

छत्तीसगढ़ का ग्रामीण समाज मुख्य रूप से खेती, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित है। यहाँ लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी रोज़ी खेती, वनोपज, पशुपालन और स्थानीय श्रम से चलती है। जब बारिश समय पर नहीं होती, या ज़रूरत से ज़्यादा हो जाती है, या लंबे सूखे के बाद अचानक बाढ़ आ जाती है—तो इसका असर सीधे उत्पादन, आमदनी और थाली तक पहुँचता है।जो किसान कभी हवा की दिशा से मौसम का अंदाज़ा लगा लेता था, वह आज मोबाइल पर मौसम ऐप देखकर भी असमंजस में है। क्योंकि अनुमान अब अनुमान भर रह गए हैं। खेत की मार केवल खेत तक नहीं रुकती—वह रसोई में पहुँचती है, स्कूल की फ़ीस रोकती है, बच्चों की पढ़ाई पर ग्रहण लगाती है, कर्ज़ का पहाड़ खड़ा करती है, और अंततः परिवार को पलायन के रास्ते पर धकेल देती है।पुरुष काम की तलाश में शहर निकल जाते हैं, और गाँव में महिलाओं के कंधों पर दोहरा बोझ आ जाता है—खेत भी वही, घर भी वही, पशु भी वही, और परिवार की भूख-प्यास की फ़िक्र भी वही। इस तरह जलवायु परिवर्तन चुपके से सामाजिक ढाँचे की दीवारों में दरार डालता जाता है।
जंगल के बेटों का दर्द

राज्य के आदिवासी अंचलों में यह संकट और भी गहरा रूप ले लेता है। आदिवासी समाज का जीवन जंगल, झरनों, पहाड़ी जलस्रोतों और स्थानीय जैव-विविधता से बुना हुआ है। महुआ, तेंदूपत्ता, चार, आम, इमली, औषधीय पौधे, मौसमी कंद-मूल—ये सब केवल आमदनी के साधन नहीं, पीढ़ियों की सांस्कृतिक विरासत भी हैं।जब मौसम चक्र टूटता है, जंगलों में आग की आशंका बढ़ती है, जलस्रोत सूखने लगते हैं, और वनोपज की उपलब्धता घटती है,तब यह केवल आर्थिक नुक़सान नहीं होता। यह सांस्कृतिक क्षति है, सामुदायिक स्मृति पर चोट है। इसीलिए छत्तीसगढ़ में जलवायु परिवर्तन को सामाजिक न्याय के प्रश्न से अलग करके देखना सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। जंगल जब रोता है, तो सबसे पहले उसके बेटों की आँखें नम होती हैं।
गर्मी से पहले टूटता शरीर

स्वास्थ्य पर भी इसका असर अब साफ़ दिखने लगा है। बेतहाशा गर्मी, गंदा पानी, जलजनित बीमारियाँ, मौसमी संक्रमण और पोषण की कमी , ये सब गरीब और ग्रामीण परिवारों पर पहले वार करती हैं। शहरों की तुलना में गाँवों में स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित हैं, इसलिए इलाज मिलने तक स्थिति अक्सर हाथ से निकल जाती है।गर्मी का पारा जब चढ़ता है, तो सबसे पहले मज़दूर टूटता है, क्योंकि उसकी रोटी खुले आसमान के नीचे पकती है। खेतिहर मज़दूर, निर्माण श्रमिक, वन-आधारित कामगार और फेरी वाले—ये सब इस संकट के सीधे निशाने पर हैं। दफ़्तर का पंखा और मज़दूर का पसीना—दोनों के बीच की दूरी ही असली असमानता की कहानी है।
असमानता का नया चेहरा
यहाँ एक बात गहराई से समझनी ज़रूरी है—जलवायु परिवर्तन केवल ‘मौसम बदल गया’ भर नहीं है। यह जीवन की पहले से मौजूद असमानताओं को और तीखा कर देता है। जिनके पास सिंचाई, बचत, पक्का मकान, तकनीक और वैकल्पिक आय के साधन हैं, वे मौसम की मार को किसी तरह झेल लेते हैं। लेकिन सीमांत किसान, भूमिहीन मज़दूर, आदिवासी परिवार, महिलाएँ और वंचित समुदाय इस परिवर्तन की सबसे भारी कीमत चुकाते हैं।इसीलिए यह सिर्फ़ पर्यावरण का विषय नहीं है। यह समाज का, अर्थनीति का, और विकास की दिशा का प्रश्न है।

सरकार के कदम : उम्मीद की किरणें
ऐसे में राज्य की भूमिका निर्णायक बन जाती है। बीते वर्षों में छत्तीसगढ़ ने इस दिशा में कुछ गंभीर पहल की हैं। जलवायु परिवर्तन को नीतिगत स्तर पर पहचाना गया है, और एक बहु-क्षेत्रीय कार्ययोजना का ढाँचा खड़ा किया गया है। कृषि, जल, वन, ऊर्जा और ग्रामीण आजीविका, सभी विभाग अब एक सुर में काम करने की कोशिश कर रहे हैं। यह समझ मज़बूत हुई है कि यह लड़ाई किसी एक विभाग के बूते नहीं जीती जा सकती।कृषि के मोर्चे पर टिकाऊ और जलवायु-सहिष्णु खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। फसल विविधीकरण, जल-संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, उन्नत बीज, और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल कृषि-विस्तार सेवाओं पर ज़ोर है। यह सोच पनप रही है कि खेती अब केवल अनाज उगाने का काम नहीं, बल्कि जलवायु-अनुकूल ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियाद है।जल प्रबंधन में भी बदलाव दिख रहा है। तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षाजल संचयन, स्थानीय जलस्रोतों की मरम्मत, लघु सिंचाई संरचनाएँ और सामुदायिक जल प्रबंधन की ज़रूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ बारिश के बावजूद जल-संकट खड़ा हो जाता है, पानी बचाना केवल तकनीक का नहीं, सामाजिक अनुशासन का विषय है।वन और पर्यावरण के क्षेत्र में भी वृक्षारोपण, वन संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के कई कार्यक्रम चल रहे हैं। यह समझ गहरी होती जा रही है कि जंगल केवल हरियाली नहीं, जलवायु का संतुलन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान भी है। सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देकर राज्य एक स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की ओर क़दम बढ़ा रहा है।
योजना और ज़मीन के बीच की दूरी

लेकिन एक सच्चाई और भी हैं, योजनाएँ बनाना आसान है, उन्हें ज़मीन तक पहुँचाना कठिन। कई बार नीतियाँ दस्तावेज़ों में चमकती हैं, पर गाँव की गलियों तक उनकी रोशनी नहीं पहुँचती। क्रियान्वयन, निगरानी, स्थानीय अनुकूलन और सामुदायिक भागीदारी , ये चार स्तंभ हैं जिन पर किसी भी योजना की सफलता टिकी होती है। सरकार को केवल फ़ाइलें नहीं, लोगों से भरोसे का रिश्ता भी बनाना होगा।
समाज: असली नायक

जलवायु परिवर्तन से लड़ाई कभी भी ऊपर से नीचे आने वाली प्रक्रिया नहीं हो सकती। असली बदलाव तब आएगा जब गाँव, पंचायत, महिला समूह, किसान संगठन, युवा मंच और स्थानीय समुदाय इस लड़ाई को अपनी लड़ाई मानेंगे। तालाब, नाले, चरागाह, सामुदायिक भूमि—इन्हें बचाना केवल प्रशासन का काम नहीं; यह हमारी साझी ज़िम्मेदारी है।किसानों को भी कुछ बुनियादी बदलाव अपनाने होंगे। एक ही फसल पर निर्भरता कम करनी होगी, कम पानी वाली फसलों की ओर मुड़ना होगा, जैविक और प्राकृतिक पद्धतियों को अपनाना होगा, मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना होगा, और पुरखों के ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ना होगा। जो किसान जोखिम बाँटना सीख लेगा, वही भविष्य की खेती कर पाएगा।
महिलाओं की आवाज़, युवाओं का जोश

ग्रामीण जीवन में जल, भोजन, ईंधन, स्वास्थ्य और पोषण के हर सवाल का सबसे नज़दीकी रिश्ता महिलाओं से है। इसलिए जलवायु समाधान की हर प्रक्रिया के केंद्र में उनकी आवाज़ होनी चाहिए। स्वयं सहायता समूह, महिला किसान समूह और पंचायतों में महिला नेतृत्व , ये इस बदलाव के सबसे मज़बूत औज़ार हैं। यह केवल प्रतिनिधित्व का मसला नहीं, व्यावहारिक बुद्धि और सामाजिक संवेदनशीलता का भी सवाल है।युवाओं से भी अपेक्षाएँ बड़ी हैं। जलवायु परिवर्तन केवल आज की पीढ़ी का नहीं, कल की पीढ़ियों का भी प्रश्न है। यदि युवा पर्यावरण शिक्षा, जल-संरक्षण, जैव-विविधता, अपशिष्ट प्रबंधन और ऊर्जा-संरक्षण में स्थानीय स्तर पर जुट जाएँ, तो यह बदलाव एक नए सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है। तकनीक-दक्ष युवा मौसम सूचना, कृषि सलाह, डिजिटल नियोजन और डेटा-आधारित समाधानों में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
अगली पीढ़ी पूछेगी—तुमने क्या बचाया? हमारे पास जवाब तैयार होना चाहिए।

विकास की नई परिभाषा
छत्तीसगढ़ के सामने सबसे ज़रूरी सवाल यह है कि हम ‘विकास’ को कैसे समझते हैं। विकास केवल सड़क, इमारत, खदान और कारखाना नहीं हो सकता। यदि विकास प्रकृति को कमज़ोर करके, जलस्रोतों को सुखाकर, जंगलों को उजाड़कर और समुदायों को असुरक्षित बनाकर आगे बढ़ता है, तो अंततः वह समाज के लिए एक महँगा सौदा साबित होगा। सच्चा विकास वही है जो पर्यावरण, सामाजिक न्याय और स्थानीय आजीविका—तीनों को एक साथ लेकर चले।
संकट नहीं, अवसर
आज छत्तीसगढ़ एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ जलवायु परिवर्तन को भविष्य का डर नहीं, वर्तमान की चुनौती मानकर सोचना होगा। चुनौती कठिन है, पर नामुमकिन नहीं। यदि राज्य की नीतियाँ, प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक समझ, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय ज्ञान , ये सब एक धागे में पिरो दिए जाएँ, तो यह संकट एक ऐतिहासिक अवसर में बदल सकता है। टिकाऊ खेती, संरक्षित जल, सुरक्षित जंगल, स्वच्छ ऊर्जा और न्यायपूर्ण विकास , यही वह नया सपना है जो छत्तीसगढ़ देख सकता है।जलवायु परिवर्तन ने हमें एक कठोर पाठ पढ़ाया है। प्रकृति से दूरी बनाकर कोई समाज सुरक्षित नहीं रह सकता। छत्तीसगढ़ की असली ताक़त उसकी मिट्टी, उसके जंगल, उसके पानी और उसके लोगों में बसती है। यदि इन्हें बचा लिया, तो भविष्य अपने आप बच जाएगा। यदि इन्हें भुला दिया, तो संकट केवल मौसम का नहीं रहेगा—वह हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारी आत्मा तक पहुँच जाएगा।

यह समय केवल चिंतन का नहीं, सामूहिक संकल्प का है”।धान का कटोरा आज भी हमारी थाली में है। बस इतना तय करना है कि कल भी रहेगा या नहीं।
लेखक परिचय:

डॉ. मनोज के. एम. चतुर्वेदी पर्यावरण, ESG, जलवायु जोखिम और सतत विकास के क्षेत्र में 25 से अधिक वर्षों के अनुभव वाले वरिष्ठ पर्यावरण रणनीतिकार हैं। उन्होंने भारत, मध्य पूर्व और यूरोप में सरकारों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा वैश्विक संस्थानों को रणनीतिक परामर्श प्रदान किया है। वे चार्टर्ड एनवायरनमेंटलिस्ट (CEnv, Society for the Environment, UK), इंस्टीट्यूट ऑफ सस्टेनेबिलिटी एंड एनवायरनमेंटल प्रोफेशनल्स (ISEP) के फेलो, तथा एनवायरनमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ ऑस्ट्रेलिया एंड न्यूज़ीलैंड (MEIANZ) के सदस्य हैं।डॉ. चतुर्वेदी UNFCCC से विशेषज्ञ समीक्षक के रूप में जुड़े रहे हैं तथा यूरोपीय आयोग के Horizon 2020 कार्यक्रम में जल विशेषज्ञ के रूप में योगदान दे चुके हैं। भारत के राष्ट्रीय ग्रीनहाउस गैस (GHG) कार्यक्रम के सह-डिज़ाइन, पर्यावरणीय आकलनों, ESG रोडमैप और नियामक रणनीतियों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
फ़ोटो सौजन्य- Dr.Shubhashis Sanyal /Mrs.Gopa Sanyal


सटीक विश्लेषण और गोपा सान्याल जी की तस्वीरों ने इस लेख को गहन चिंतन से रचनात्मकता की ओर मोड़ दिया ।
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