
रायपुर, 19 अप्रैल 2026।
अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में आस्था, परंपरा और उत्साह का अनूठा संगम देखने को मिला। इस दिन को ‘अबूझ मुहूर्त’ के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है, जिसके चलते बिना पंचांग देखे ही विवाह, गृह प्रवेश, खरीदारी और नए कार्यों की शुरुआत शुभ मानी जाती है। प्रदेश के शहरों से लेकर गांवों तक पूरे दिन धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक गतिविधियों की धूम रही।
🟡 1. गुड्डे-गुड़ियों के विवाह: परंपरा की अनोखी झलक
छत्तीसगढ़ में अक्षय तृतीया की विशेष पहचान यहां की पारंपरिक ‘गुड्डे-गुड़ियों के विवाह’ से जुड़ी है। ग्रामीण अंचलों और बच्चों के बीच यह परंपरा आज भी जीवंत है। छोटे-छोटे बच्चे अपने घरों और मोहल्लों में गुड्डे-गुड़ियों की बारात निकालते हैं, रंग-बिरंगे मंडप सजाए जाते हैं और पूरे विधि-विधान से विवाह समारोह आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में महिलाएं और बुजुर्ग भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं, जिससे यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है।
🟡 2. मंदिरों में भीड़, पूजा-अर्चना और दान-पुण्य
अक्षय तृतीया के दिन धार्मिक आस्था अपने चरम पर दिखाई दी। प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की गई। कई स्थानों पर हवन, भजन-कीर्तन और सत्संग का आयोजन हुआ। मान्यता है कि इस दिन किए गए दान-पुण्य का फल अक्षय होता है, यानी कभी समाप्त नहीं होता। इसी विश्वास के साथ लोगों ने जल सेवा, अन्न वितरण और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
🟡 3. बाजारों में रौनक: सोना-चांदी की खरीदारी तेज
अक्षय तृतीया के अवसर पर सराफा बाजारों में भी जबरदस्त रौनक देखने को मिली। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और भिलाई सहित प्रदेश के विभिन्न शहरों में लोग बड़ी संख्या में सोने और चांदी के आभूषण, सिक्के और बर्तन खरीदते नजर आए। व्यापारियों के अनुसार इस दिन खरीदारी को समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है, जिसके चलते बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ज्वेलर्स द्वारा विशेष छूट और ऑफर भी दिए गए।

🟡 4. सामाजिक एकता और आर्थिक गतिविधियों को मिला बढ़ावा
अक्षय तृतीया का पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता और आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती प्रदान करता है। विभिन्न सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा जरूरतमंदों के लिए भोजन, कपड़े और जल वितरण के कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसके साथ ही लोगों ने जमीन, वाहन और घरेलू सामान की खरीदारी भी शुभ मानते हुए निवेश किया। यह पर्व समाज में सहयोग, सद्भाव और परंपराओं को जीवित रखने का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है।
अक्षय तृतीया का यह पर्व एक बार फिर यह साबित करता है कि भारतीय संस्कृति में परंपरा, आस्था और आधुनिक जीवनशैली का संतुलन किस प्रकार सहज रूप से बना हुआ है। छत्तीसगढ़ में गुड्डे-गुड़ियों के विवाह जैसी अनूठी परंपराएं इस सांस्कृतिक विरासत को और भी समृद्ध बनाती हैं।


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