Central Samvadनई दिल्ली, 15 जून 2026

भारत की पारंपरिक ज्ञान विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत उडुपी में तिगलारी और प्राचीन कन्नड़ लिपियों में लिखी आयुर्वेद पांडुलिपियों के लिप्यंतरण पर 15 दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यशाला शुरू हुई है। इस कार्यशाला का आयोजन आयुष मंत्रालय के अंतर्गत आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान केंद्रीय परिषद (सीसीआरएएस) और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू) द्वारा श्री वदिराजा अनुसंधान फाउंडेशन के सहयोग से किया जा रहा है।

कार्यशाला का उद्देश्य तिगलारी और प्राचीन कन्नड़ लिपियों में संरक्षित दुर्लभ आयुर्वेद पांडुलिपियों को पढ़ने, समझने और लिपिबद्ध करने के लिए विद्वानों को प्रशिक्षित करना है। कार्यक्रम में आयुर्वेद और संस्कृत पृष्ठभूमि के युवा शोधार्थी तथा छात्र भाग ले रहे हैं।सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रो. वैद्य रबीनारायण आचार्य ने उद्घाटन समारोह में कहा कि भारत की समृद्ध आयुर्वेदिक ज्ञान परंपरा के संरक्षण, प्रलेखन और प्रसार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने ज्ञान भारतम मिशन के तहत पारंपरिक ज्ञान संसाधनों को संरक्षित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को अप्रकाशित आयुर्वेद पांडुलिपियों के अध्ययन, लिप्यंतरण, संपादन और प्रकाशन की प्रक्रिया का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
तैयार की गई पांडुलिपियों को बाद में सीसीआरएएस और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित किया जाएगा, जिससे दुर्लभ आयुर्वेदिक ज्ञान आम लोगों और शोधकर्ताओं तक पहुंच सकेगा।यह सीसीआरएएस और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित तीसरी कार्यशाला है।
इससे पहले ओडिशा के पुरी और केरल के गुरुवायूर में भी प्राचीन भारतीय लिपियों से जुड़ी कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी हैं।

