पूर्वाभिमुखी शिवलिंग का रहस्य : जहाँ भाई-बहन एक साथ नहीं करते हैं दर्शन
आलेख : ज्ञानेंद्र पांडेय

पर्यटन छत्तीसगढ़” के प्रथम अंक में आप सभी पाठकों का स्वागत है। इस श्रृंखला में हम पाठकों को राजधानी रायपुर के आसपास स्थित सप्ताहांत बिताने (Weekend Destinations) के लिए उपयुक्त स्थानों से लेकर 2-3 दिनों की छुट्टियों का आनंद लेने हेतु नैसर्गिक, धार्मिक तथा हरित पर्यटन स्थलों के संबंध में विस्तार से अवगत कराएँगे।
यदि हम अपनी यात्रा राजधानी रायपुर से प्रारंभ करते हैं, तो इसके चारों ओर अनेक ऐसे स्थान हैं जो अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इसी कड़ी में सबसे पहले चलते हैं सिरपुर से कसडोल मार्ग पर नारायणपुर ग्राम में स्थित नारायण विहार के दर्शन के लिए।

छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में बहती पवित्र महानदी के तट पर स्थित ग्राम नारायणपुर एक अद्भुत ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर को संजोए हुए है। यहाँ स्थित 10वीं शताब्दी का प्राचीन शिव मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अपनी स्थापत्य कला और रहस्यमयी कथाओं के कारण भी अत्यंत आकर्षक स्थल है।
पूर्वाभिमुखी शिवलिंग की अनूठी विशेषता
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूर्वाभिमुखी शिवलिंग है, जो छत्तीसगढ़ में अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, पूर्व दिशा को ऊर्जा और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक माना जाता है, जिससे इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। दूर-दूर से श्रद्धालु इस अनोखे शिवलिंग के दर्शन हेतु यहाँ पहुँचते हैं।बलुआ पत्थर से निर्मित इस भव्य मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियाँ प्राचीन शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यहाँ की मैथुन कला की मूर्तियाँ प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर और खजुराहो मंदिर समूह की कलाकृतियों की याद दिलाती हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा इन मूर्तियों को संरक्षित कर एक सुरक्षित कक्ष में रखा गया है, जिससे इस धरोहर का संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (10वीं–11वीं शताब्दी)
इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर 10वीं–11वीं शताब्दी में निर्मित हुआ था। खरौद में प्राप्त 1181 ई. के शिलालेख से संकेत मिलता है कि उस समय हयवंशी राजाओं ने इस क्षेत्र में एक भव्य उद्यान का निर्माण कराया था, जिससे इस मंदिर की प्राचीनता और महत्व स्पष्ट होता है।
रहस्यमयी निर्माण की लोककथा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण रात्रि के समय लगभग छह महीनों में किया गया। किंवदंती के अनुसार, मंदिर के प्रधान शिल्पी नारायण जनजातीय समुदाय से थे, जिनके नाम पर ही इस गाँव का नाम पड़ा। कहा जाता है कि वे रात में निर्वस्त्र होकर मंदिर निर्माण करते थे और उनकी पत्नी उन्हें भोजन देने आती थीं। एक दिन उनकी पत्नी की जगह उनकी बहन भोजन लेकर आ गईं। इस घटना से लज्जित होकर नारायण ने मंदिर के कंगूरे से कूदकर प्राण त्याग दिए।इसी कथा के कारण आज भी स्थानीय परंपरा में भाई-बहन एक साथ मंदिर दर्शन नहीं करते।
अधूरा मंदिर और कलश का रहस्य
हिंदू मंदिरों में शिखर पर कलश स्थापना पूर्णता का प्रतीक होती है, लेकिन इस मंदिर में लंबे समय तक कलश स्थापित नहीं हो पाया था। हाल के वर्षों में कलश स्थापना कर पूजा प्रारंभ की गई, फिर भी मंदिर के पास स्थित एक अन्य संरचना आज भी अधूरी है, जहाँ न तो मूर्ति स्थापित हुई और न ही कलश।मान्यता है कि शिल्पी की मृत्यु के कारण यह मंदिर अधूरा रह गया।वार्षिक मेला और सांस्कृतिक महत्वहर वर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक यहाँ तीन दिवसीय भव्य मेले का आयोजन होता है। यह मेला स्थानीय संस्कृति, आस्था और परंपराओं का जीवंत संगम है, जहाँ श्रद्धालु, पर्यटक और शोधकर्ता बड़ी संख्या में भाग लेते हैं।

कैसे पहुँचें?
राजधानी रायपुर से नारायण विहार की दूरी इस प्रकार है —
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- रायपुर से सिरपुर — 85 किलोमीटर
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- सिरपुर से नारायणपुर — 41 किलोमीटर
- रायपुर से नारायण विहार (नारायणपुर) की कुल दूरी — 126 किलोमीटर
लेखक – श्री ज्ञानेंद्र पांडेय
लेखक परिचय :
लेखक परिचय :श्री ज्ञानेंद्र पांडेय , स्टार्टअप कोच, उद्यमी, वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर एवं ट्रैवल-टूरिज्म ब्लॉगर हैं। वे शुरुआती स्टार्टअप्स को व्यवसायिक रणनीति, ब्रांड निर्माण और मार्केट विस्तार में मार्गदर्शन देते हैं। वन्यजीवन फोटोग्राफी और यात्रा लेखन के माध्यम से वे प्रकृति, स्थानीय संस्कृति और पर्यटन को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं।उनका मानना है — “ऐसे व्यवसाय बनाइए जो मूल्य पैदा करें, ऐसे पल कैद कीजिए जो जागरूकता लाएँ और ऐसी यात्राएँ कीजिए जो सोच को व्यापक बनाएँ।”
📍 रायपुर, छत्तीसगढ़

