Central Samvadरायपुर, 5 जुलाई
छत्तीसगढ़ की लोक कला और पंडवानी गायन को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात रायपुर एम्स में निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं और पिछले काफी समय से गंभीर रूप से बीमार थीं। उन्होंने रात करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में किया जाएगा।डॉ. तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अनूठी कापालिक शैली की प्रस्तुति से पंडवानी गायन को वैश्विक मंच तक पहुंचाया।

भारतीय लोक संस्कृति में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया था।उनका जन्म 24 अप्रैल 1956 को भिलाई के गनियारी गांव में हुआ था। पारधी जनजाति से आने वाली तीजन बाई ने अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुनकर पंडवानी गायन की प्रेरणा ली। बाद में गायक उमेद सिंह देशमुख से प्रशिक्षण प्राप्त किया और मात्र 13 वर्ष की आयु में पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी।
वह पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली पहली महिला कलाकार बनीं।सामाजिक विरोध और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने कला सफर को नहीं छोड़ा। औपचारिक शिक्षा न मिलने के बावजूद उनकी कला को देशभर में सम्मान मिला और उन्हें चार विश्वविद्यालयों ने डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान की।पिछले लगभग दो वर्षों से वह अस्वस्थ थीं और रायपुर एम्स में विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनका उपचार चल रहा था।
उनकी तबीयत को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूर्व में फोन कर हालचाल जाना था और हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया था।डॉ. तीजन बाई के निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश के लोक कला जगत में शोक की लहर है। उनका योगदान भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में सदैव अमिट रहेगा।

