
डॉ सूरज मुक्ति ‘सम्राट’
एसोसिएट प्रोफेसर- मेकेनिकल (एन आई टी, रायपुर )
॥ विजय पताका फहराऊँगा ॥
चूकने के डर से बाण चलाना ना छोड़ूँगा,
थकने के डर से कदम बढ़ाना ना छोड़ूँगा।
कठिन परीक्षा हो चाहे जीवन की,
सत्य की राह अपनाना ना छोड़ूँगा,
करने दो साबित झूठा दुनिया को,
सत्य के मार्ग पर, सत्य ध्वज लहराना ना छोड़ूँगा।।
क्या हुआ, अंधेरों से घिरा हूँ आज,
‘सूरज’ ना सही, दीप बन जलना ना छोड़ूँगा।।
रास्ते कठिन हों चाहे कितने,
लड़ हौसलों से, आगे बढ़ना ना छोड़ूँगा।।
आएगी जब भी आहट हार की,
मन को फिर संभालूँगा मैं,
गिरकर भी हर बार उठूँगा,
सपनों को अपने पालूँगा मैं।
विश्वास को ना टूटने दूँगा,
समय चाहे लेता रहे परीक्षा,
तपकर संकल्पों की अग्नि में,
ज़िंदा रखूँगा अपनी स्वयं की इच्छा।
जब तक मंज़िल हाथ न आए,
प्रयासों का दीप जलाऊँगा मैं
जीवन की इस रणभूमि में,विजय पताका फहराऊँगा मैं।।
जीवन की इस रणभूमि में,विजय पताका फहराऊँगा मैं।।

